(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

आश्वमेधिकपर्व


॥ श्रीः ॥
14.73. अध्यायः 073
Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Topics
अर्जुनेन युधिष्ठिरनियोगाद्ब्राह्मणैः क्षत्रियैश्च सह प्रथममुत्तरदिश्यश्वसञ्चारणेन रक्षणाय तदनुसरणम्॥ 1 ॥
Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच।

दीक्षाकाले तु सम्प्राप्ते ततस्ते सुमहर्त्विजः।
विधिवद्दीक्षयामासुरश्वमेधाय पार्थिवम्॥ 14-73-1(94498)
कृत्वा स पशुमेधांश्च दीक्षितः पाण्डुनन्दनः।
धर्मराजो महातेजाः सहर्त्विग्भिर्व्यरोचत॥ 14-73-2(94499)
हयश्च हयमेधार्थं स्वयं स ब्रह्मवादिना।
उत्सृष्टः शास्त्रविधिना व्यासेनामिततेजसा॥ 14-73-3(94500)
स राजा राजधर्मेण दीक्षितो विबभौ तदा।
हेममाली रुक्मकण्ठः प्रदीप्त इव पावकः॥ 14-73-4(94501)
कृष्णाजिनी दण्डपाणिः क्षौमवासाः स धर्मजः।
विबभौ द्युतिमान्भूयः प्रजापतिरिवाध्वरे॥ 14-73-5(94502)
तथैवास्यर्त्विजः सर्वे तुल्यवेषा विशांपते।
बभूवुरर्जुनश्चापि प्रदीप्त इव पावकः॥ 14-73-6(94503)
श्वेताश्वः कपिकेतुश्च ससाराश्वं धनञ्जयः।
विधिवत्पृथिवीपाल धर्मराजस्य शासनात्॥ 14-73-7(94504)
**क्षिपन्गाण्डिवं राजन्बद्धगोधाङ्गुलित्रवान्।
तमश्वं पृथिवीपाल मुदा युक्तः ससार च॥ 14-73-8(94505)
अनुमार्गं तदा राजन्नागमत्तत्पुरं विभो।
द्रष्टुकामं कुरुश्रेष्ठं प्रयास्यनतं धनञ्जयम्॥ 14-73-9(94506)
तेषामन्योन्यसम्मर्दादूष्मेव समाजायत।
दिदृक्षूणां हयं तं च तं चैव हयसारिणम्॥ 14-73-10(94507)
ततः शब्दो महाराज दिशः खं प्रतिपूरयन्।
बभूव प्रेक्षतां नॄमां कुन्तीपुत्रं धनंजयम्॥ 14-73-11(94508)
एष गच्छति कौन्तेयस्तुरगश्चैव दीप्तिमान्।
समन्वेति महाबाहुः संस्पृशन्धनुरुत्तमम्॥ 14-73-12(94509)
एवं शुश्राव वदतां गिरो जिष्णुरुदारधीः।
स्वस्ति तेऽस्तु व्रजारिष्टं पुनश्चैहीति भारत॥ 14-73-13(94510)
अथापरे मनुष्येन्द्र पुरुषा वाक्यमब्रुवन्।
नैनं पश्याम सम्मर्दे धनुरेतत्प्रदृश्यते॥ 14-73-14(94511)
एतद्धि भीमनिर्ह्रादं विश्रुतं गाण्डिवं धनुः।
स्वस्ति गच्छत्वरिष्टो वै पन्थानमकुतोभयम्।
निवृत्तमेनं द्रक्ष्यामः पुनरेष्यति च ध्रुवम्॥ 14-73-15(94512)
एवमाद्या मनुष्याणां स्त्रीणां च भरतर्षभ।
शुश्राव मधुरा वाचः पुनःपुनरुदारधीः॥ 14-73-16(94513)
याज्ञवल्क्यस्य शिष्यश्च कुशलो यज्ञकर्मणि।
प्रायात्पार्थेन सहितः शान्त्यर्थं वेदपारगः॥ 14-73-17(94514)
ब्राह्मणाश्च महीपाल बहवो वेदपारगाः।
अनुजग्मुर्महात्मानं क्षत्रियाश्च विशाम्पते।
विधिवत्पृथिवीपाल धर्मराजस्य शासनात्॥ 14-73-18(94515)
पाण्डवैः पृथिवीमश्वो निर्जितामस्त्रतेजसा।
चचार स महाराज यथादेशं च सत्तम॥ 14-73-19(94516)
तत्र युद्धानि वृत्तानि यान्यासन्पाण्डवस्य ह।
तानि वक्ष्यामि ते वीर विचित्राणि महान्ति च॥ 14-73-20(94517)
स हयः पृथिवीं राजन्प्रदक्षिणमवर्तत।
ससारेत्तरतः पूर्वं तन्निबोध महीपते॥ 14-73-21(94518)
अवमृद्रन्स राष्ट्राणि पार्थिवानां हयोत्तमः।
शनैस्तदा परिययौ श्वेताश्वश्च महारथः॥ 14-73-22(94519)
तत्र सङ्गणना नास्ति राज्ञामयुतशस्तदा।
येऽयुध्यन्त महाराज क्षत्रिया हतबान्धवाः॥ 14-73-23(94520)
किराता यवना राजन्बहवोऽसिधनुर्धराः।
म्लेच्छाश्चान्ये बहुविधाः पूर्वं ये निकृता रणे॥ 14-73-24(94521)
आर्याश्च पृथिवीपालाः प्रहृष्टनरवाहनाः।
समीयुः पाण्डुपुत्रेण बहवो युद्धदुर्मदाः॥ 14-73-25(94522)
एवं वृत्तानि युद्धानि तत्रतत्र महीपते।
अर्जुनस्य महीपालैर्नानादेशसमागतैः॥ 14-73-26(94523)
यान्यत्र हयतो राजन्प्रवृत्तानि महान्ति च।
तानि युद्धानि वक्ष्यामि कौन्तेयस्य तवानघ॥ ॥ 14-73-27(94524)

इति श्रीमन्महाभारते आश्वमेधिकपर्वणि अनुगीतापर्वणि त्रिसप्ततितमोऽध्यायः॥ 73 ॥

Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Footnotes
7-73-9 आकुमारं तदा राजन् इति झ.पाठः॥ 7-73-17 शिष्यः सोमश्रवाः॥


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